श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 111: रामायण- काव्य का उपसंहार और इसकी महिमा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.111.3 
ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:।
नित्यं शृण्वन्ति संहृष्टा: काव्यं रामायणं दिवि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उन प्रभु के पवित्र चरित्र के कारण ही देवलोक में देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि सदैव इस रामायण काव्य को आनन्दपूर्वक सुनते हैं॥3॥
 
Due to the sacred character of that Lord, the gods, Gandharvas, Siddhas and Maharishis always listen to this Ramayana poem with pleasure in the world of gods. 3॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd