श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 111: रामायण- काव्य का उपसंहार और इसकी महिमा  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  7.111.14-15h 
हेमभारं कुरुक्षेत्रे ग्रस्ते भानौ प्रयच्छति॥ १४॥
यश्च रामायणं लोके शृणोति सदृशावुभौ।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक भार सोना दान करता है और जो इस लोक में प्रतिदिन रामायण सुनता है, दोनों को समान पुण्य प्राप्त होता है ॥14 1/2॥
 
One who donates a load of gold at the time of solar eclipse at Kurukshetra and one who listens to the Ramayana every day in this world, both acquire equal merit. ॥ 14 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)