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ramayan 7.110.10-11: महामहावी परमेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो चतुर्भुज विष्णु के रूप में प्रवेश करें अथवा अपने सनातन, दिव्य, अव्यक्त ब्रह्म में निवास करें। हे प्रभु! आप सम्पूर्ण लोकों के आश्रय हैं। आपकी प्राचीन पत्नी सीता देवी, जो योगमाया (ह्लादिनी शक्ति) स्वरूपा और विशाल नेत्रों वाली हैं, के अतिरिक्त आपको कोई भी आपके वास्तविक रूप में नहीं जानता; क्योंकि आप अचिन्त्य, अविनाशी और बुढ़ापे आदि से रहित परब्रह्म हैं। अतः हे महामहावी राघवेन्द्र! आप जिस रूप में चाहें, प्रवेश करें (स्थित हों)॥10-11॥   |   ramayan सर्ग 7.110: भाइयों सहित श्रीराम का विष्णुस्वरूप में प्रवेश तथा साथ आये हुए सब लोगों को संतानक- लोक की प्राप्ति   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 110: भाइयों सहित श्रीराम का विष्णुस्वरूप में प्रवेश तथा साथ आये हुए सब लोगों को संतानक- लोक की प्राप्ति  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  7.110.10-11 
वैष्णवीं तां महातेजो यद्वाऽऽकाशं सनातनम्।
त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां केचित् प्रजानते॥ १०॥
ऋते मायां विशालाक्षीं तव पूर्वपरिग्रहाम्।
त्वामचिन्त्यं महद् भूतमक्षयं चाजरं तथा।
यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
महामहावी परमेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो चतुर्भुज विष्णु के रूप में प्रवेश करें अथवा अपने सनातन, दिव्य, अव्यक्त ब्रह्म में निवास करें। हे प्रभु! आप सम्पूर्ण लोकों के आश्रय हैं। आपकी प्राचीन पत्नी सीता देवी, जो योगमाया (ह्लादिनी शक्ति) स्वरूपा और विशाल नेत्रों वाली हैं, के अतिरिक्त आपको कोई भी आपके वास्तविक रूप में नहीं जानता; क्योंकि आप अचिन्त्य, अविनाशी और बुढ़ापे आदि से रहित परब्रह्म हैं। अतः हे महामहावी राघवेन्द्र! आप जिस रूप में चाहें, प्रवेश करें (स्थित हों)॥10-11॥
 
‘Maha-mahavi Parameshwar! If you wish, enter in the form of four-armed Vishnu or reside in your eternal, celestial, unmanifested Brahman. O Lord! You are the shelter of all the worlds. No one knows you in your true form except your ancient wife, Sita Devi, who is in the form of Yogmaya (Hladini Shakti) and has huge eyes; because you are the unthinkable, indestructible and the Supreme Brahman, devoid of the states of old age etc. Therefore, O Maha-mahavi Raghavendra! Enter (be established) in whatever form you wish.’॥10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)