श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 107: वसिष्ठजी के कहने से श्रीराम का पुरवासियों को अपने साथ ले जाने का विचार तथा कुश और लव का राज्याभिषेक करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.107.5 
भरतश्च विसंज्ञोऽभूच्छ्रुत्वा राघवभाषितम्।
राज्यं विगर्हयामास वचनं चेदमब्रवीत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्री रघुनाथजी के वचन सुनकर भरतजी मूर्च्छित हो गए और राज्य की निन्दा करते हुए इस प्रकार बोले-॥5॥
 
Bharata lost his senses after hearing Shri Raghunath's words. He started criticizing the kingdom and spoke thus -॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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