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श्लोक 7.107.2  |
अद्य राज्येऽभिषेक्ष्यामि भरतं धर्मवत्सलम्।
अयोध्याया: पतिं वीरं ततो यास्याम्यहं वनम्॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| आज मैं अपने धर्मप्रेमी वीर भाई भरत को अयोध्या का राजा अभिषिक्त करूँगा। तत्पश्चात् वन को चला जाऊँगा॥ 2॥ |
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| Today I will anoint my brave brother Bharat, who loves Dharma, as the king of Ayodhya. After that I will go to the forest.॥ 2॥ |
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