श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 107: वसिष्ठजी के कहने से श्रीराम का पुरवासियों को अपने साथ ले जाने का विचार तथा कुश और लव का राज्याभिषेक करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.107.13 
पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो ह्यनुत्तम:।
सपुत्रदारा: काकुत्स्थ समं गच्छाम सत्पथम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थ! यदि आप नगरवासियों से प्रेम करते हैं, यदि हम लोगों पर आपका अत्यन्त स्नेह है, तो कृपया हमें अपने साथ चलने की अनुमति दीजिए। हम अपनी स्त्री-पुत्रों सहित आपके साथ सन्मार्ग पर चलने को तैयार हैं।॥13॥
 
‘Kakutstha! If you love the people of the city, if you have the utmost affection for us, then please allow us to come with you. We, along with our wives and children, are ready to walk on the right path with you.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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