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श्लोक 7.105.5  |
तच्छ्रुत्वा ऋषिशार्दूल: क्रोधेन कलुषीकृत:।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं निर्दहन्निव चक्षुषा॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| यह सुनकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित होकर लक्ष्मण की ओर इस प्रकार देखने लगे मानो उन्हें अपने नेत्रों की अग्नि से जलाकर भस्म कर देंगे। वे उनसे इस प्रकार बोले-॥5॥ |
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| On hearing this, the great sage Durvasa was infuriated and started looking at Lakshmana as if he would burn him to ashes with the fire of his eyes. He also spoke to him thus -॥ 5॥ |
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