श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.105.4 
किं कार्यं ब्रूहि भगवन् को ह्यर्थ: किं करोम्यहम्।
व्यग्रो हि राघवो ब्रह्मन् मुहूर्तं परिपाल्यताम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! कहिए, आपका क्या कार्य है? क्या प्रयोजन है? और मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? हे ब्रह्म! इस समय श्री रघुनाथजी किसी अन्य कार्य में लगे हुए हैं; अतः आप दो घड़ी तक उनकी प्रतीक्षा करें॥4॥
 
Lord! Tell me, what is your work? What is the purpose? And what service can I render to you? Brahman! At this time Shri Raghunathji is engaged in some other work; hence please wait for him for two hours.'॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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