श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.105.3 
मुनेस्तु भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मण: परवीरहा।
अभिवाद्य महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मुनि के ये वचन सुनकर शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले लक्ष्मण ने उन महात्मा को प्रणाम किया और ये वचन कहे-॥3॥
 
On hearing these words of the sage, Lakshmana, the slayer of enemy warriors, bowed to that great soul and said these words -॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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