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श्लोक 7.105.13  |
अद्य वर्षसहस्रस्य समाप्तिर्मम राघव।
सोऽहं भोजनमिच्छामि यथासिद्धं तवानघ॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| हे भोले रघुनन्दन! मैंने एक हजार वर्ष तक व्रत किया था। आज मेरे व्रत का समापन है, अतः इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन बनेगा, मैं उसे खाना चाहता हूँ।॥13॥ |
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| Innocent Raghunandan! I fasted for a thousand years. Today is the end of my fast, so I want to eat whatever food is prepared at your place at this time.'॥ 13॥ |
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