श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 105: दुर्वासा के शाप के भय से लक्ष्मण का नियम भङ्ग करके श्रीराम के पास इनके आगमन का समाचार देने के लिये जाना, श्रीराम का दुर्वासा मुनि को भोजन कराना और उनके चले जाने पर लक्ष्मण के लिये चिन्तित होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  7.105.11 
सोऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा।
किं कार्यमिति काकुत्स्थ: कृताञ्जलिरभाषत॥ ११॥
 
 
अनुवाद
महात्मा दुर्वासा को प्रणाम करके उनके तेज से प्रकाशित श्री रघुनाथजी ने हाथ जोड़कर पूछा - 'महर्षि! मेरे लिए क्या आदेश है?' 11॥
 
After paying obeisance to Mahatma Durvasa, glowing with his radiance, Shri Raghunath ji asked with folded hands - 'Maharshe! What is the order for me?' 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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