श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 104: कालका श्रीरामचन्द्रजी को ब्रह्माजी का संदेश सुनाना और श्रीराम का उसे स्वीकार करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.104.8 
सोऽहं संन्यस्तभारो हि त्वामुपास्य जगत्पतिम्।
रक्षां विधत्स्व भूतेषु मम तेजस्करो भवान्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जब यह भार मुझ पर डाला गया, तब मैंने जगत के स्वामी आपकी आराधना करके प्रार्थना की कि, ‘प्रभु! आप सब प्राणियों में निवास करें और उनकी रक्षा करें, क्योंकि आप ही मुझे तेज (ज्ञान और कर्मशक्ति) प्रदान करने वाले हैं।’॥8॥
 
‘When this burden was placed on me, I worshipped You, the Lord of the Universe, and prayed, ‘Prabhu! Please reside in all beings and protect them, because You are the one who bestows me with brilliance (knowledge and power of action).'॥ 8॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas