श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम के यहाँ कालका आगमन और एक कठोर शर्त के साथ उनका वार्ता के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.103.5 
जयस्व राजधर्मेण उभौ लोकौ महाद्युते।
दूतस्त्वां द्रष्टुमायातस्तपसा भास्करप्रभ:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
महातेजस्वी महाराज! आप अपने राजधर्म के प्रभाव से इस लोक और परलोक में विजयी हों। एक महान ऋषि दूत बनकर आपसे मिलने आए हैं। वे तप से उत्पन्न तेज से सूर्य के समान प्रकाशित हो रहे हैं।॥5॥
 
‘Maha-radiant Maharaj! May you be victorious in this world as well as the other world with the influence of your royal duty. A great sage has come to meet you as a messenger. He is shining like the Sun with the brilliance generated by penance.'॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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