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ramayan 7.101.12: दोनों नगर धन-धान्य और रत्नों से परिपूर्ण थे। अनेक वन उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे गुणों के विस्तार में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हों और बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ रहे हों॥12॥   |   ramayan सर्ग 7.101: भरत का गन्धर्वों पर आक्रमण और उनका संहार करके वहाँ दो सुन्दर नगर बसाकर अपने दोनों पुत्रों को सौंपना और फिर अयोध्या को लौट आना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 101: भरत का गन्धर्वों पर आक्रमण और उनका संहार करके वहाँ दो सुन्दर नगर बसाकर अपने दोनों पुत्रों को सौंपना और फिर अयोध्या को लौट आना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.101.12 
धनरत्नौघसंकीर्णे काननैरुपशोभिते।
अन्योन्यसंघर्षकृते स्पर्धया गुणविस्तरै:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
दोनों नगर धन-धान्य और रत्नों से परिपूर्ण थे। अनेक वन उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे गुणों के विस्तार में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हों और बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ रहे हों॥12॥
 
Both the cities were filled with wealth, grains and gems. Numerous forests added to their beauty. It was as if they were competing with each other in terms of expansion of qualities and moving ahead with great difficulty.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)