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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.10.6 
विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मपर: शुचि:।
पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
विभीषण सदैव सदाचारी थे। वे सदाचारी रहे, शुद्ध आचरण और विचारों का पालन करते रहे और पाँच हज़ार वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहे।
 
‘Vibhishana was always a virtuous person. He remained virtuous and followed pure conduct and thoughts and stood on one leg for five thousand years.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)