श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  7.10.48 
ईदृशं किमिदं वाक्यं ममाद्य वदनाच्च्युतम्।
अहं व्यामोहितो देवैरिति मन्ये तदागतै:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
‘अहा! आज मेरे मुख से ऐसी बात क्यों निकली? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि ब्रह्माजी के साथ आए देवताओं ने मुझे उस समय मूर्च्छित कर दिया था।’॥48॥
 
‘Oh! Why did such a thing come out of my mouth today? I think that the gods who had come with Brahmaji had put me in a trance at that time.’॥ 48॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd