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ramayan 7.10.4: फिर वर्षा ऋतु में वह खुले मैदान में वीरासन लगाकर बैठ गया और बादलों द्वारा बरसाए गए जल में भीगता रहा और शीत ऋतु में प्रतिदिन जल के अंदर ही रहने लगा॥4॥   |   ramayan सर्ग 7.10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.10.4 
मेघाम्बुसिक्तो वर्षासु वीरासनमसेवत।
नित्यं च शिशिरे काले जलमध्यप्रतिश्रय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
फिर वर्षा ऋतु में वह खुले मैदान में वीरासन लगाकर बैठ गया और बादलों द्वारा बरसाए गए जल में भीगता रहा और शीत ऋतु में प्रतिदिन जल के अंदर ही रहने लगा॥4॥
 
Then during the rainy season, he sat in Veerasan in an open field and kept getting drenched in the water poured by the clouds and during the winter season, he started staying inside the water every day. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)