Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 7.10.31-32: मैं जिस किसी आश्रम के विषय में जो कुछ विचार करूँ, वह धर्म के अनुकूल हो और मैं उसी धर्म का पालन करूँ; यही मेरे लिए सर्वोत्तम एवं परम वांछनीय वर है ॥31-32॥ | ramayan सर्ग 7.10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति । ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
या या मे जायते बुद्धिर्येषु येष्वाश्रमेषु च॥ ३१॥
सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं धर्मं च पालये।
एष मे परमोदारो वर: परमको मत:॥ ३२॥
अनुवाद
मैं जिस किसी आश्रम के विषय में जो कुछ विचार करूँ, वह धर्म के अनुकूल हो और मैं उसी धर्म का पालन करूँ; यही मेरे लिए सर्वोत्तम एवं परम वांछनीय वर है ॥31-32॥
Whatever thought I have about any ashrama, let it be in accordance with the Dharma and let me follow that Dharma; this is the best and most desirable boon for me. ॥ 3 1-32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥