श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 10: रावण आदि की तपस्या और वर-प्राप्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  7.10.20 
नहि चिन्ता ममान्येषु प्राणिष्वमरपूजित।
तृणभूता हि ते मन्ये प्राणिनो मानुषादय:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
‘देववन्द्य पितामह! मुझे अन्य प्राणियों की ज़रा भी चिंता नहीं है। मैं मनुष्य आदि प्राणियों को तिनके के समान समझता हूँ।’
 
‘Devvandya Pitamah! I am not concerned at all about other creatures. I consider other creatures like humans to be like straws.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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