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श्लोक 7.10.20  |
नहि चिन्ता ममान्येषु प्राणिष्वमरपूजित।
तृणभूता हि ते मन्ये प्राणिनो मानुषादय:॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘देववन्द्य पितामह! मुझे अन्य प्राणियों की ज़रा भी चिंता नहीं है। मैं मनुष्य आदि प्राणियों को तिनके के समान समझता हूँ।’ |
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| ‘Devvandya Pitamah! I am not concerned at all about other creatures. I consider other creatures like humans to be like straws.’ |
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