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श्लोक 7.10.1  |
अथाब्रवीन्मुनिं राम: कथं ते भ्रातरो वने।
कीदृशं तु तदा ब्रह्मंस्तपस्तेपुर्महाबला:॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| यह कथा सुनकर श्री रामचन्द्रजी ने अगस्त्य मुनि से पूछा - 'ब्रह्मन्! उन तीनों महाबली भाइयों ने वन में किस प्रकार और किस प्रकार की तपस्या की थी?'॥1॥ |
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| After listening to this story, Shri Ramchandraji asked Agastya Muni - 'Brahmin! How and what type of penance did those three Mahabali brothers perform in the forest?' 1॥ |
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