महोदरं प्रहस्तं च विरूपाक्षं च राक्षसम्॥ ३५॥
मत्तोन्मत्तौ च दुर्धर्षौ देवान्तकनरान्तकौ।
अतिक्रम्य महावीरान् किं प्रशंसथ रावणिम्॥ ३६॥
अनुवाद
'महोदर, प्रहस्त, विरुपाक्ष, मदता, उन्मत्त और दुर्धर्ष, वीर देवान्तक और नरान्तक - इन महान वीरों का अपमान करके आप रावणकुमार इन्द्रजीत की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? 35-36॥
‘Mahodar, Prahastha, Virupaksha, Madta, Unmatt and Durdharsha, the brave Devantaka and Narantaka – why are you praising Ravanakumar Indrajit by violating these great heroes? 35-36॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥