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श्लोक 6.92.68  |
स तद् दुरात्मा सुहृदा निवेदितं
वच: सुधर्म्यं प्रतिगृह्य रावण:।
गृहं जगामाथ ततश्च वीर्यवान्
पुन: सभां च प्रययौ सुहृद्वृत:॥ ६८॥ |
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| अनुवाद |
| अपने मित्र के कहे हुए उत्तम एवं धर्मयुक्त वचनों को स्वीकार करके बलवान एवं दुष्टचित्त रावण अपने महल में लौट आया और वहाँ से उसने अपने मित्रों के साथ राज दरबार में प्रवेश किया। |
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| After accepting the excellent and righteous words spoken by his friend, the strong and evil-minded Ravana returned to his palace and from there he entered the royal court with his friends. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विनवतितम: सर्ग: ॥ ९ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ २॥ |
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