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श्लोक 6.92.48-49h  |
सीता दु:खसमाविष्टा विलपन्तीदमब्रवीत्।
यथायं मामभिक्रुद्ध: समभिद्रवति स्वयम्॥ ४८॥
वधिष्यति सनाथां मामनाथामिव दुर्मति:। |
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| अनुवाद |
| सीता दुःख में डूब गईं और विलाप करते हुए बोलीं- 'यह दुष्टबुद्धि राक्षस जिस प्रकार क्रोध में आकर स्वयं मेरी ओर दौड़ रहा है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि भली-भाँति सुरक्षित होने पर भी यह अनाथ की भाँति मुझे मार डालेगा।' |
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| Sita was drowned in sorrow and while lamenting she said - 'The way this evil-minded demon is himself running towards me in anger, it seems that in spite of being well-protected he will kill me like an orphan. 48 1/2. |
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