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श्लोक 6.92.31  |
तेन मामद्य संयुक्तं रथस्थमिह संयुगे।
प्रतीयात् कोऽद्य मामाजौ साक्षादपि पुरंदर:॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| अतः यदि आज मैं युद्ध के लिए तैयार होकर रथ पर बैठकर युद्धभूमि में खड़ा हो जाऊँ, तो मेरा सामना कौन कर सकेगा? यहाँ तक कि स्वयं इन्द्र भी मुझसे युद्ध करने का साहस नहीं कर सकता॥31॥ |
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| ‘Therefore if today I get ready for war and sit on a chariot and stand on the battlefield, who can face me? Even Indra himself cannot dare to fight with me.॥ 31॥ |
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