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श्लोक 6.92.19  |
कोपाद् विजृम्भमाणस्य वक्त्राद् व्यक्तमिव ज्वलन्।
उत्पपात सधूमाग्निर्वृत्रस्य वदनादिव॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे वृत्रासुर के मुख से धुएँ सहित अग्नि प्रकट हुई थी, उसी प्रकार क्रोध से जम्भाई लेते हुए रावण के मुख से धुएँ सहित जलती हुई अग्नि प्रकट हुई॥19॥ |
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| Just as fire with smoke had appeared from the mouth of Vritrasura, in the same way burning fire with smoke appeared from the mouth of Ravana, yawning with anger. 19॥ |
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