श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 90: इन्द्रजित और लक्ष्मण का भयंकर युद्ध तथा इन्द्रजित का वध  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  6.90.31 
ते तस्य वज्रप्रतिमा: शरा: सर्पविषोपमा:।
विलयं जग्मुरागत्य कवचं काञ्चनप्रभम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
उसके वे वज्र के समान बाण सर्प के विष के समान घातक थे, फिर भी वे लक्ष्मण के स्वर्णमय चमकते कवच से टकराकर वहीं नष्ट हो गए ॥31॥
 
Those thunderbolt-like arrows of his were as deadly as the poison of a snake, yet they collided with the golden shining armor of Lakshman and were destroyed on the spot. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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