श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 87: इन्द्रजित और विभीषण की रोषपूर्ण बातचीत  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.87.5 
अदृश्य: सर्वभूतानां ततो भवति राक्षस:।
निहन्ति समरे शत्रून् बध्नाति च शरोत्तमै:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इसलिए यह राक्षस युद्धस्थल में समस्त प्राणियों के लिए अदृश्य हो जाता है और उत्तम बाणों द्वारा शत्रुओं को मारकर बाँध देता है ॥5॥
 
Therefore this demon becomes invisible to all creatures on the battlefield and kills and ties up the enemies with excellent arrows. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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