श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 87: इन्द्रजित और विभीषण की रोषपूर्ण बातचीत  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.87.4 
इहोपहारं भूतानां बलवान् रावणात्मज:।
उपहृत्य तत: पश्चात् संग्राममभिवर्तते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानन्दन! यह बलवान रावणकुमार प्रतिदिन यहाँ आकर पहले भूतों को बलि चढ़ाता है और फिर युद्ध में लग जाता है॥4॥
 
Sumitranandan! This powerful Ravana Kumar comes here every day and first sacrifices himself to the ghosts and then engages in war. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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