श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 87: इन्द्रजित और विभीषण की रोषपूर्ण बातचीत  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.87.22 
परस्वहरणे युक्तं परदाराभिमर्शकम्।
त्याज्यमाहुर्दुरात्मानं वेश्म प्रज्वलितं यथा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो दुष्टात्मा दूसरों का धन लूटता है और दूसरे की स्त्री को स्पर्श करता है, वह जलते हुए घर के समान त्यागने योग्य कहा गया है॥ 22॥
 
That evil soul who robs others' wealth and touches another's wife is said to be one who is to be abandoned like a burning house.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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