श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 86: वानरों और राक्षसों का युद्ध, हनुमान्जी के द्वारा राक्षस सेना का संहार और उनका इन्द्रजित को द्वन्द्वयुद्ध के लिये ललकारना तथा लक्ष्मण का उसे देखना  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  6.86.33-34 
य: स वासवनिर्जेता रावणस्यात्मसम्भव:।
स एष रथमास्थाय हनूमन्तं जिघांसति॥ ३३॥
तमप्रतिमसंस्थानै: शरै: शत्रुनिवारणै:।
जीवितान्तकरैर्घोरै: सौमित्रे रावणिं जहि॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानन्दन! जिस रावण का पुत्र इन्द्र को भी परास्त कर चुका है, वह इस रथ पर बैठा हुआ हनुमानजी को मारना चाहता है। अतः आप अपने उन भयंकर बाणों द्वारा, जो अद्वितीय आकार और परिमाण वाले हैं तथा शत्रुओं का नाश करने वाले हैं, उस रावणपुत्र का वध कर दीजिए।॥33-34॥
 
Sumitranandan! The son of Ravana who has defeated even Indra, is sitting on this chariot and wants to kill Hanuman. Therefore, you kill that son of Ravana with your dreadful arrows which are of unique shape and size and which destroy the enemies.'॥ 33-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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