श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 86: वानरों और राक्षसों का युद्ध, हनुमान्जी के द्वारा राक्षस सेना का संहार और उनका इन्द्रजित को द्वन्द्वयुद्ध के लिये ललकारना तथा लक्ष्मण का उसे देखना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.86.10 
शस्त्रैश्च विविधाकारै: शितैर्बाणैश्च पादपै:।
उद्यतैर्गिरिशृङ्गैश्च घोरैराकाशमावृतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ का आकाश नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों, तीखे बाणों, उलटे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत शिखरों से आच्छादित था॥10॥
 
The sky there was covered with various kinds of weapons, sharp arrows, upturned trees and dreadful mountain peaks.॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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