श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 85: विभीषण के अनुरोध से श्रीरामचन्द्रजी का लक्ष्मण को इन्द्रजित के वध के लिये जाने की आज्ञा देना और सेना सहित लक्ष्मण का निकुम्भिला-मन्दिर के पास पहुँचना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.85.7 
भूयस्तु मम विज्ञाप्यं तच्छृणुष्व महाप्रभो।
त्वय्यकारणसंतप्ते संतप्तहृदया वयम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! अब एक बार फिर मेरी बात सुनिए। आपके अकारण ही दुःखी होने से हमारा हृदय भी व्यथित है।
 
‘Maharaj! Now once again, please listen to what I have to offer you. Our hearts are also filled with anguish because you are upset without any reason.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)