श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 83: सीता के मारे जाने की बात सुनकर श्रीराम का शोक से मूर्च्छित होना और लक्ष्मण का उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थ के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  6.83.40 
येषां नश्यत्ययं लोकश्चरतां धर्मचारिणाम्।
तेऽर्थास्त्वयि न दृश्यन्ते दुर्दिनेषु यथा ग्रहा:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले और तप में लगे हुए मनुष्यों की सांसारिक चेष्टाएँ धन के अभाव में नष्ट हो जाती हैं। इस विपत्तिकाल में तुम्हें धन दिखाई नहीं देता, जैसे आकाश में बादल घिर आने पर ग्रह दिखाई नहीं देते।॥40॥
 
‘It is clearly seen that the worldly endeavours of those who follow the path of Dharma and are engaged in austerity are destroyed due to lack of wealth. In these bad times, wealth is not visible to you just as the planets are not visible when clouds gather in the sky.॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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