श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 83: सीता के मारे जाने की बात सुनकर श्रीराम का शोक से मूर्च्छित होना और लक्ष्मण का उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थ के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  6.83.30 
अधर्मसंश्रितो धर्मो विनाशयति राघव।
सर्वमेतद् यथाकामं काकुत्स्थ कुरुते नर:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
‘रघुनन्दन! जो धर्म धर्म से भिन्न है और पुरुषार्थ से संयुक्त है, वह शत्रुओं का नाश करता है। इसलिए हे ककुत्स्थ! प्रत्येक मनुष्य अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुसार इन सब (धर्म और पुरुषार्थ) का पालन करता है॥ 30॥
 
‘Raghunandan! The Dharma which is different from Dharma and is combined with Purushaarth destroys the enemies. Therefore, Kakutstha! Every human being performs all these (Dharma and Purushaarth) according to his need and interest.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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