श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 83: सीता के मारे जाने की बात सुनकर श्रीराम का शोक से मूर्च्छित होना और लक्ष्मण का उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थ के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.83.23 
अथवा विहितेनायं हन्यते हन्ति चापरम्।
विधि: स लिप्यते तेन न स पापेन कर्मणा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
‘अथवा यदि यह जीव विधिपूर्वक किए गए किसी विशेष कर्म (श्येनयाग आदि) से मारा जाए अथवा स्वयं ऐसे कर्म द्वारा किसी दूसरे को मारे तो केवल वह कर्म (विहित कर्म से उत्पन्न अदृश्य) ही हत्या के पाप में लिप्त हो, कर्म करने वाला उस पापकर्म से युक्त न हो। (क्योंकि पुत्र के किए हुए अपराध का दण्ड पिता को नहीं मिलता)॥
 
‘Or if this living being is killed by a special act (Shyenayag etc.) performed as per the prescribed rules or if he himself kills another by doing such an act then only the act (the unseen arising out of the prescribed act) should be involved in the sin of killing, the person performing the act should not be associated with that sinful act. (Because the father does not get punished for the crime committed by the son)॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd