श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 83: सीता के मारे जाने की बात सुनकर श्रीराम का शोक से मूर्च्छित होना और लक्ष्मण का उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थ के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.83.22 
वध्यन्ते पापकर्माणो यद्यधर्मेण राघव।
वधकर्महतोऽधर्म: स हत: कं वधिष्यति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘रघुनन्दन! यदि पापी मनुष्य धर्म या अधर्म द्वारा मारे जाएँ, तो धर्म या अधर्म कर्मरूप होने के कारण केवल तीन क्षणों (आदि, मध्य और अन्त) तक ही टिक सकता है। चौथे क्षण में वह स्वयं ही नष्ट हो जाएगा; फिर वह नष्ट हुआ धर्म या अधर्म किसे मारेगा?॥22॥
 
‘Raghunandan! If sinful men are killed by Dharma or Adharma, then Dharma or Adharma, being in the form of an action, can last for only three moments (beginning, middle and end). In the fourth moment, it will get destroyed on its own; then whom will that destroyed Dharma or Adharma kill?॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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