श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 83: सीता के मारे जाने की बात सुनकर श्रीराम का शोक से मूर्च्छित होना और लक्ष्मण का उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थ के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.83.21 
यस्मादर्था विवर्धन्ते येष्वधर्म: प्रतिष्ठित:।
क्लिश्यन्ते धर्मशीलाश्च तस्मादेतौ निरर्थकौ॥ २१॥
 
 
अनुवाद
परन्तु जिनमें अधर्म स्थापित है, उनका धन बढ़ता है और जो स्वभावतः धर्मात्मा हैं, वे संकट में हैं। अतः धर्म और अधर्म दोनों ही व्यर्थ हैं॥ 21॥
 
‘But those in whom irreligion is established, their wealth is increasing and those who are naturally righteous are in trouble. Therefore, both righteousness and irreligion are meaningless.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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