श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 83: सीता के मारे जाने की बात सुनकर श्रीराम का शोक से मूर्च्छित होना और लक्ष्मण का उन्हें समझाते हुए पुरुषार्थ के लिये उद्यत होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  6.83.18 
तस्य च व्यसनाभावाद् व्यसनं चागते त्वयि।
धर्मो भवत्यधर्मश्च परस्परविरोधिनौ॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘रावण को कोई संकट नहीं है और तुम संकट में हो; इसलिए धर्म और अधर्म दोनों परस्पर विरोधी हो गए हैं – पुण्यात्मा को दुःख और पापी को सुख मिल रहा है॥18॥
 
‘Ravana is not in any danger and you are in trouble; hence both Dharma and Adharma have become opposed to each other – the virtuous person is getting pain and the sinful person is getting happiness.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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