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श्लोक 6.83.14  |
शुभे वर्त्मनि तिष्ठन्तं त्वामार्य विजितेन्द्रियम्।
अनर्थेभ्यो न शक्नोति त्रातुं धर्मो निरर्थक:॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| आर्य! तुम सदैव सत्यमार्ग पर दृढ़ रहते हो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हो, फिर भी धर्म तुम्हें बुराइयों से बचाने में असमर्थ है, इसलिए वह तुम्हें व्यर्थ प्रतीत होता है॥ 14॥ |
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| ‘Arya! You are always steadfast on the right path and have controlled your senses, yet Dharma (religion) is unable to save you from evils. That is why it seems useless to you.॥ 14॥ |
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