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श्लोक 6.83.1  |
राघवश्चापि विपुलं तं राक्षसवनौकसाम्।
श्रुत्वा संग्रामनिर्घोषं जाम्बवन्तमुवाच ह॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान् श्री राम ने भी राक्षसों और वानरों की वह महान युद्ध-घोषणा सुनी और जाम्बवान से कहा-॥1॥ |
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| Lord Shri Ram also heard that great war cry of demons and monkeys and said to Jambavan -॥ 1॥ |
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