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श्लोक 6.80.43  |
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं
रघुप्रवीर: प्लवगर्षभैर्वृत:।
वधाय रौद्रस्य नृशंसकर्मण-
स्तदा महात्मा त्वरितं निरीक्षते॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार महान् मन से वचन कहकर रघुकुल के प्रधान वीर महात्मा श्री रामचन्द्रजी वानरों से घिरे हुए उस क्रूर एवं भयानक राक्षस को मार डालने के लिए तुरन्त ही इधर-उधर देखने लगे। |
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| Having thus uttered words with a great intention, the brave Mahatma Shri Ramchandraji, the chief of the Raghu clan, surrounded by monkey heads, immediately started looking here and there to kill that cruel and dreadful demon. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽशीतितम: सर्ग: ॥ ८ ०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ०॥ |
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