श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 80: रावण की आज्ञा से इन्द्रजित का घोर युद्ध तथा उसके वध के विषयमें श्रीराम और लक्ष्मण की बातचीत  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.80.35 
नास्य वेगगतिं कश्चिन्न च रूपं धनु: शरान्।
न चास्य विदितं किंचित् सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
इंद्रजीत की तीव्र गति, रूप, धनुष और बाण को कोई नहीं देख सका। बादलों के पीछे छिपे सूर्य के समान, कोई भी उसके विषय में कुछ नहीं जान सका ॥35॥
 
No one could see Indrajit's swift movements, form, bow and arrows. Like the sun hidden behind the clouds, no one could know anything about him. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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