श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 80: रावण की आज्ञा से इन्द्रजित का घोर युद्ध तथा उसके वध के विषयमें श्रीराम और लक्ष्मण की बातचीत  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  6.80.11 
हुत्वाग्निं तर्पयित्वाथ देवदानवराक्षसान्।
आरुरोह रथश्रेष्ठमन्तर्धानगतं शुभम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
अग्नि में आहुति देकर देवताओं, दानवों और राक्षसों को संतुष्ट करके इन्द्रजित् बंदी शक्ति से युक्त सुन्दर रथ पर सवार हुआ॥11॥
 
After satisfying the gods, demons and rakshasas by offering sacrifices in the fire, Indrajit mounted on a beautiful chariot endowed with the power of incarceration. 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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