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श्लोक 6.75.37  |
उद्घुष्टं वानराणां च राक्षसानां च नि:स्वनम्।
ज्याशब्दस्तावुभौ शब्दावति रामस्य शुश्रुवे॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| वानरों की गर्जना और राक्षसों के कोलाहल के ऊपर भी भगवान राम के धनुष की टंकार सुनाई दे रही थी ॥37॥ |
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| The twang of Lord Rama's bow could be heard above the roaring of the monkeys and the uproar of the demons. ॥ 37॥ |
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