श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 75: लङ्कापुरी का दहन तथा राक्षसों और वानरों का भयंकर युद्ध  »  श्लोक 11-13h
 
 
श्लोक  6.75.11-13h 
तनुत्राणि च योधानां हस्त्यश्वानां च वर्म च।
खड्गा धनूंषि ज्याबाणास्तोमराङ्कुशशक्तय:॥ ११॥
रोमजं वालजं चर्म व्याघ्रजं चाण्डजं बहु।
मुक्तामणिविचित्रांश्च प्रासादांश्च समन्तत:॥ १२॥
विविधानस्त्रसंघातानग्निर्दहति तत्र वै।
 
 
अनुवाद
योद्धाओं के कवच, हाथी और घोड़ों के कवच, तलवार, धनुष, प्रत्यंचा, बाण, कुदाल, अंकुश, भाला, कम्बल, पंखा, बैठने के लिए व्याघ्रचर्म, कस्तूरी, मोती और रत्नों से जड़ा हुआ विचित्र महल तथा नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र - ये सब चारों ओर फैली हुई अग्नि से जल रहे थे।
 
The armour of warriors, the armour of elephants and horses, the sword, the bow, the bowstring, the arrow, the tomahawk, the goad, the spear, the blanket, the fan, the tiger's skin for seating, the musk, the strange palace studded with pearls and gems, and various kinds of weapons - all these were being burned by the fire spreading all around.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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