श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 74: जाम्बवान् के आदेश से हनुमान्जी का हिमालय से दिव्य ओषधियों के पर्वत को लाना और उन ओषधियों की गन्ध से श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरों का पुनः स्वस्थ होना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  6.74.47 
तस्य नानद्यमानस्य श्रुत्वा निनदमुत्तमम्।
लङ्कास्था राक्षसव्याघ्रा न शेकु: स्पन्दितुं क्वचित् ॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हनुमानजी की बार-बार की गर्जना सुनकर लंका के बड़े-बड़े राक्षस इतने भयभीत हो गए कि हिल भी नहीं सके ॥47॥
 
Hearing the loud roar of Hanuman repeatedly, the great demons of Lanka were so frightened that they could not even move. ॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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