श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 74: जाम्बवान् के आदेश से हनुमान्जी का हिमालय से दिव्य ओषधियों के पर्वत को लाना और उन ओषधियों की गन्ध से श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरों का पुनः स्वस्थ होना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  6.74.20 
नैव राजनि सुग्रीवे नाङ्गदे नापि राघवे।
आर्य संदर्शित: स्नेहो यथा वायुसुते पर:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
आर्य! तुमने राजा सुग्रीव, अंगद या भगवान राम के प्रति वैसा स्नेह नहीं दिखाया जैसा पवनपुत्र हनुमान के प्रति तुम्हारे अगाध प्रेम से स्पष्ट है।'
 
Arya! You have not shown the same affection towards King Sugreeva, Angad or Lord Rama as is evident from your intense love for Hanuman, the son of the wind.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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