श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 74: जाम्बवान् के आदेश से हनुमान्जी का हिमालय से दिव्य ओषधियों के पर्वत को लाना और उन ओषधियों की गन्ध से श्रीराम, लक्ष्मण एवं समस्त वानरों का पुनः स्वस्थ होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.74.17 
नैर्ऋतेन्द्र महावीर्य स्वरेण त्वाभिलक्षये।
विद्धगात्र: शितैर्बाणैर्न त्वां पश्यामि चक्षुषा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे महाबली राक्षसराज! मैं आपको केवल आपकी वाणी से ही पहचान सकता हूँ। मेरे सारे अंग तीखे बाणों से बिंधे हुए हैं, इसलिए मैं आपको खुली आँखों से नहीं देख सकता।॥17॥
 
‘O mighty demon king! I can only recognise you by your voice. All my limbs are pierced with sharp arrows, so I cannot see you with my eyes open.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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