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श्लोक 6.73.74  |
ततस्तदा वानरसैन्यमेवं
रामं च संख्ये सह लक्ष्मणेन।
विषादयित्वा सहसा विवेश
पुरीं दशग्रीवभुजाभिगुप्ताम्।
संस्तूयमान: स तु यातुधानै:
पित्रे च सर्वं हृषितोऽभ्युवाच॥ ७४॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार युद्ध में वानर सेना तथा लक्ष्मण सहित श्रीराम को मूर्छित करके इन्द्रजित् अचानक दस मुख वाले रावण की भुजाओं से पोषित लंकापुरी में चला गया। उस समय समस्त निशाचर प्राणी उसकी स्तुति कर रहे थे। वहाँ जाकर उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता को अपनी विजय का सारा समाचार सुनाया। 74. |
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| In this way, after rendering unconscious the army of monkeys and Shri Ram along with Lakshman in the battle, Indrajit suddenly went to Lankapuri, which was nurtured by the arms of the ten-headed Ravana. At that time all the nocturnal creatures were praising him. Going there, he happily told his father the whole news of his victory. 74. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिसप्ततितम: सर्ग: ॥ ७ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ३॥ |
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