श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 73: इन्द्रजित के ब्रह्मास्त्र से वानरसेना सहित श्रीराम और लक्ष्मण का मूर्च्छित होना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  6.73.70 
मन्ये स्वयंभूर्भगवानचिन्त्य-
स्तस्यैतदस्त्रं प्रभवश्च योऽस्य।
बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन्
मया सहाव्यग्रमना: सहस्व॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
स्वयंभू ब्रह्माजी का स्वरूप अकल्पनीय है। वे ही इस जगत के आदि कारण हैं। मैं मानता हूँ कि यह उनका अस्त्र है। अतः हे सुमित्रापुत्र! तुम मन में किसी प्रकार का भय न आने दो और मेरे साथ चुपचाप खड़े रहो और इन बाणों का प्रहार सहन करो। 70.
 
‘The form of the self-born Lord Brahma is inconceivable. He is the original cause of this universe. I believe that this is His weapon. Therefore, O wise son of Sumitra, do not let any kind of panic come in your mind and stand here quietly with me and bear the onslaught of these arrows. 70.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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